Difference Between Large Cap Mid Cap and Small Cap स्टॉक्स क्या होते है?
इस आर्टिकल में हम Large Cap, Mid Cap and Small Cap स्टॉक्स क्या होते है? उनके क्या फायदे और नुकसान है, कैसे स्टॉक्स में आपको
इन्वेस्ट करना चाहिए, इसके बारे में बात करेंगे। मैंने पिछले आर्टिकल में मार्केट
कैपिटलाइजेशन और शेयर प्राइस के बारे में बात की थी।
Difference Between Large Cap Mid Cap and Small Cap।
ऐक्चूअली मार्केट कैपिटलाइजेशन के हिसाब से डिसाइड होता है की, किसी कंपनी का कितना मार्केट कैपिटलाइजेशन है, मतलब की उस कंपनी
की मार्केट में वैल्यू कितनी है? लेकिन जब आप इंटरनेट पर रिसर्च करेंगे तो आपको अलग अलग
डेफिनेशन सुनने को मिलेंगी।
कोई कहेगा की 10,000 करोड़ से ज्यादा मार्केट कैप वाली कंपनी Large Cap होती है। कहीं पर आपको 20,000 करोड़ वैल्यू देखने मिलेंगे।Small Cap में कहीं पर आपको 250 करोड़ की वैल्यू देखने को मिलेगी। कही पे आपको 2000 करोड़, 5000 करोड़ की वैल्यू देखने को मिलेगी, तो अब एग्ज़ैक्ट डेफिनिशन क्या है? ये एक्चुअली कोई यूनिफॉर्म नहीं है।
इसी के लिए सेबी ने इसको यूनिफॉर्म बनाने के लिए एक सर्कुलर निकाला था, 2017 के अंदर, और म्यूचुअल
फंड क्योंकि Small Cap, Mid Cap और Large Cap में इन्वेस्ट करते हैं, उसके लिए
बेसिकली सर्कुलर निकाला गया था।
हम वही एग्ज़ैक्ट्ली देखेंगे की ऐक्ट डेफिनेशन क्या दी है? सेबी ने। Difference Between Large Cap Mid Cap and Small Cap फिर साथ में हम ये भी समझेंगे कि आप को कैसे चयन करना चाहिए। कैसे चूज करना चाहिए? कि आप Small Cap में, या Mid Cap में या Large Cap में इन्वेस्ट करे।
Difference Between Large Cap Mid Cap and Small Cap जानने के लिए हमें मार्केट कैपिटलाइजेशन समझना जरूरी है।
मार्केट कैपिटलाइजेशन क्या है?
जो भी कंपनी लिस्टेड होती है, स्टॉक मार्केट के ऊपर उसका एक शेयर प्राइस होता है। अगर आप
उस शेयर प्राइस से टोटल नम्बर ऑफ आउटस्टैंडिंग शेयर जीतने भी है, उस कंपनी के
उससे मल्टीप्लाई कर देते हैं, तो आपको मार्केट कैपिटलाइजेशन मिल जाता है।
मार्केट कैपिटलाइजेशन का मतलब क्या है? ये बेसिकली उस कंपनी की टोटल मार्केट वैल्यू है। अगर किसी को ये कंपनी खरीदनी हो तो उसको ये टोटल मार्केट वैल्यू Pay करनी पड़ेगी तो वो कंपनी खरीद पाएगा।
अब हम Large Cap, Mid Cap और Small Cap के डेफिनेशन देखते है।
सेबी सर्क्युलर: सेबी ने सर्कुलर निकाला था 6 अक्टूबर 2017 को। ये बेसिकली म्यूचुअल फंड स्कीम्स को
यूनिफॉर्म करने के लिए है। अदर्वाइज़ क्लिअर नहीं हो पाता है की, Large Cap एग्ज़ैक्ट्ली है क्या? Mid Cap एग्ज़ैक्ट्ली क्या है? और Small Cap क्या है?
Large Cap स्टॉक्स क्या है?
सेबी के हिसाब से Large Cap कम्पनीज़ वो है जो टॉप 100 कम्पनीज़ है। As Per मार्केट कैपिटलाइजेशन। तो जितना भी उनका
मार्केट कैपिटलाइजेशन है तो जो टॉप 100 कम्पनीज़ है फर्स्ट से लेके 100 तक वो Large Cap में आती है।
Mid Cap स्टॉक्स क्या है?
Mid Cap में 101एंड फर्स्ट से लेके 250 तक, जो भी कंपनी आती है। मार्केट कैपिटलाइजेशन के हिसाब से वो
Mid Cap कंपनी हो गई।
Small Cap स्टॉक्स क्या है?
Small Cap कंपनी आपकी 250 ऑनवर्ड जितनी भी कम्पनीज़ है As Per मार्केट कैपिटलाइजेशन, वो Small Cap
हो गयी।
अगर आप ये जानना चाहते है ये सारी कंपनीस कौन सी है? तो आप निफ्टी 100 इंडेक्स फ़ॉलो
कर सकते हैं। निफ्टी 100 इंडेक्स में आपको ये फर्स्ट से लेके 100 तक कम्पनीज़ मिल जाएगी।
उसके बाद एक निफ्टी 150 Mid Cap इंडेक्स होता है। उसके अंदर आपको ये 150 कम्पनीज़ मिल
जाएगी।
और ये जो आपको 250 ऑनवर्ड जो कंपनीज है, इसके लिए आप निफ्टी 250
Small Cap
इंडेक्स फ़ॉलो कर सकते हैं। निफ्टी का ये जो 250 Small Cap इंडेक्स है,
ये 250 से लेके 500
तक वाली सारी
कंपनीस। जो As Per मार्केट
कैपिटलाइजेशन है, उनका इंडेक्स होता है।
इंडेक्स पता कहाँ से चलते हैं?
ये निफ्टी की वेबसाइट पे हम देख लेते हैं। हम निफ्टी में भी देख लेते है नेशनल
स्टॉक एक्सचेंज की वेबसाइट है एनएसई इंडिया.कॉम।
अब हम इन स्टॉक्स को Large Cap, Mid Cap या
Small Cap को कंपेर कर लेते हैं। कुछ पैरामीटर्स के ऊपर। जैसे की रिटर्न पोटेंशिअल
कितना रहता है, इनमें रिस्क किस तरीके के रहते है?
लिक्विडिटी: मतलब वॉल्यूम
कितना ट्रेड होता है। अगर आपने कोई स्टॉक खरीदा है तो आप उसको बेच पाएंगे की नहीं
उसके लिए आपको खरीदा मिलना भी तो ज़रूरी है।
फिर वोलैटिलिटी कितनी रहती है? वोलैटिलिटी का मतलब है की डेली
बेसिस पे प्राइस कितना ऊपर-नीचे जा रहा है, उसे हम कहते है वोलैटिलिटी। वो भी हम देखेंगे, इनमें कैसा कैसा रहता है इंस्टिट्यूशनल इन्वेस्टर्स। मतलब म्यूचुअल
फंड हो गए, आपके फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स हो गए, वो कैसे स्टॉक्स के अंदर
ज्यादा निवेश करते हैं।
Large Cap कम्पनीज़ के अंदर रिटर्न पोटेंशिअल कैसा रहता है?
लार्ज कम्पनीज़ के अंदर “मॉडरेट” रहता है। क्योंकि ये कंपनी इतनी ज्यादा बड़ी हो गयी है की, इनके लिए नए बिज़नेस और न्यू ग्रोथ अपॉर्च्यूनिटीज ढूंढना
थोड़ा सा मुश्किल हो जाता है।
अब मान लीजिये कोई एक कंपनी 3,00,000 करोड़ का, उसका ऑलरेडी मार्केट
कैपिटलाइजेशन है, वो उससे ज्यादा ग्रोथ कितना कर पाएगी? वो अगर उसको
डबल करने के लिए 6,00,000 करोड़ पहुंचना होगा।
रिस्क पोटेंशिअल मॉडरेट होता है। लेकिन एट द सेम टाइम इनका
रिस्क भी लो होता है तो जब अगर मार्केट गिरती है बाई चांस तो ये जो Large Cap
स्टॉक्स होते हैं ये काफी स्टेबल बिज़नेस होते हैं। इनका स्टॉक भी कम गिरता है।
लिक्विडिटी की बात करें तो बहुत हाई रहती है, क्योंकि इस
बहुत सारे इंस्टिट्यूशनल इन्वेस्टर्स है। रीटेल इन्वेस्टर्स है खरीद बिक्री Large Cap कंपनी के अंदर चलती रहती है तो कभी भी ऐसा नहीं होगा की आपको कोई खरीदारी ना
मिले किसी स्टॉक के लिए।
वोलैटिलिटी की अगर हम बात करें तो वोलैटिलिटी इनके अंदर कम
होती है। स्टॉक बहुत ज्यादा ऊपर नीचे नहीं जाता है और इंस्टिट्यूशनल इन्वेस्टर्स
काफी ज्यादा इन्वेस्ट करते हैं।
एग्जाम्पल्स की बात करें तो बड़ी पॉपुलर कम्पनीज़ हम ले सकते
हैं जो आपके स्टॉक एक्स्चेंज में लेट से सेंसेक्स टॉप 30 कम्पनीज़ में भी आ जाती है। निफ्टी 50 इंडेक्स की बात करें तो उसमें आ जाती है जैसे: रिलायंस, टीसीएस,
इन्फोसिस,
एचडीएफसी,
आइसीआइसीआइ,
L&T ये सारी बड़ी बड़ी कंपनी का
नाम आपने जरूर सुने होंगे।
Mid Cap कम्पनीज़ के
अंदर रिटर्न पोटेंशिअल कैसा रहता है?
Mid Cap कम्पनीज़ के
अंदर रिटर्न पोटेंशिअल काफी हाई रहता है। क्योंकि ये ग्रोथ की
ओप्पोर्चुनिटी काफी ज्यादा हो सकती है, Mid Cap के
अंदर। अब मान लीजिए कोई कंपनी है जिसका चार या 5000 करोड़ मार्केट कैपिटलाइजेशन
है। तो वो हो सकता है Large Cap कंपनी बन जाए। फ्यूचर में। अगर वो 10 गुना तक
रिटर्न्स देना शुरू कर देती है।
10 गुना उसकी मान लीजिये। अर्निंग्स हो जाती है तो नैचुरली
उसका प्राइस भी 10 गुना हो सकता है। पॉसिबिलिटी है 5000 करोड़ से 50,000 करोड़ पहुंचने
की डेफिनेटली ज्यादा पॉसिबिलिटी है।
रिस्क की अगर हम बात करे डेफिनेटली रिस्क ज़्यादा ही होता है। Large Cap के
मुकाबले अगर मार्केट नीचे जाती है तो Mid Cap स्टॉक्स जल्दी नीचे जाते हैं। Large Cap के मुकाबले।
लिक्विडिटी की बात कर रहे हैं तो लिक्विडिटी अच्छी रहती
है। रीज़नेबल हाइ रहती है, Small Cap के मुकाबले तो डेफिनेटली काफी हाई रहती है। हाँ,
Large Cap मैं और ज्यादा लिक्विडिटी होती है।
वोलैटिलिटी की बात करें तो वोलैटिलिटी भी इसके अंदर High रहती है, क्योंकि ऊपर नीचे जाता रहता है इसके अंदर प्राइस। आप कई बार
कुछ स्टॉक्स में देखेंगे की एक 2% Per
day की भी वोलैटिलिटी आ जाती है। मतलब एक ही दिन के अंदर प्राइस एक या 2%
3% तक भी ऊपर नीचे
चल। जाता है। इंस्टिट्यूशनल इन्वेस्टर्स डेफिनेटली म्यूचुअल फंड और फॉरेन
इंस्टीट्यूशनल इनवेस्टर्स काफी इंटरेस्टेड होते हैं। Mid Cap कंपनी इसके अंदर
क्योंकि वो एक मल्टीबैगर्स स्टॉक्स की तलाश में होते हैं, उनको भी आखिर इन्वेस्टर्स
को रिटर्न्स देने है तो इंस्टिट्यूशनल इन्वेस्टर्स Mid Cap कंपनी ढूंढ़ते रहते हैं।
ऐसी की वो Large Cap बन सके। फ्यूचर में।
एग्जाम्पल की बात करें तो बायोकॉन एक बाइओ फार्मा
कंपनी है। फिर क्रिसिल एक रेटिंग एजेंसी है। अपोलो टायर्स के बारे
में भी आपने डेफिनेटली सुना होगा? तो ये सारी आज की डेट में Mid Cap कम्पनीज़ है।
Small Cap कम्पनीज़ के
अंदर रिटर्न पोटेंशिअल कैसा रहता है?
Small Cap कंपनी की बात करते हैं रिटर्न पोटेंशिअल काफी हाई रहता है,
इसीलिए लोग
Small Cap में इन्वेस्ट करने की सोचते भी हैं।
रिस्क भी काफी हाई रहता है। इसका भी आप थोड़ा सा ध्यान
दीजिये। जब मार्केट नीचे जाती है तो Small Cap कंपनी सबसे पहले स्टॉक्स जो होते है
उनके वो सबसे पहले नीचे जाते हैं और काफी ज्यादा गिरावट देखने को मिल जाती है। 25%
30% की गिरावट
देखने को मिल जाती है।
लिक्विडिटी की बात करें तो लिक्विडिटी लो हो जाती है,
क्योंकि अगर Selling एक बार स्टार्ट होती है, हो सकता है आपको कोई खरीदार
ना मिले तो लिक्विडिटी कम हो जाती है क्योंकि खरीदार कम है तो प्राइस और नीचे जाने
के चान्सेस हो जाते हैं और सिमिलरली जब ऊपर जा रही है मार्केट तो क्योंकि खरीदार कम
है तो आपको प्राइस ऊपर जाने की भी संभावना है। ज्यादा बढ़ जाए।
वोलैटिलिटी की अगर हम बात करे वोलैटिलिटी काफी हाई होती है,
प्राइस काफी
ऊपर नीचे चला जाता है। अगर हम Mid Cap के मुकाबले बात करें तो ये वोलैटिलिटी काफी
ज्यादा हाई हो जाती है और ये 5% 10% Per
day तक भी वोलैटिलिटी देखने को मिल जाती है। Small Cap स्टॉक्स के अंदर
इंस्टिट्यूशनल इन्वेस्टर्स कम होते हैं। Small Cap के अंदर बहुत ही कम निवेश करते
हैं इंस्टिट्यूशनल इन्वेस्टर्स।
एग्जाम्पल्स की बात करूँ तो मैं यहाँ पे आपको रिफरेन्स दे
देता हूँ तो ये इलाहाबाद बैंक फॉर एग्जाम्पल, बॉम्बे डाइंग एस्कोर्ट्स
लिमिटेड स्कोर्स ऑटोमोबाइल कंपनी है तो ये कंपनीस बेसिकली Small Cap में आती है।
आज की डेट में।
निष्कर्ष:
ध्यान रखिए यहाँ पे कई बार Small Cap कंपनी Mid Cap में जा सकती है। उसको कोई
नहीं रोक रहा है। अगर मान लीजिये उसका बिज़नेस अच्छा जाता है। काफी फन्डामेंटल
स्ट्रॉन्ग है, वो Mid Cap बन सकती है और Mid Cap से फाइनली Large Cap भी बन
सकती है और ये उल्टा भी हो सकता है। Large Cap भी वापस Mid Cap बन सकती है और Mid Cap से वापस Small Cap भी बन सकती है। और होने को तो बैंक करप्ट भी होती है तो
ऐसा कुछ ज़रूरी नहीं है। जो Large Cap आज है, वो हमेशा ही Large Cap
रहेगा
जो Large Cap कंपनीज होती है, कई बार हम इनको ब्लूचिप स्टॉक्स भी बोलते
हैं। तो अगर आपको कहीं पे ब्लूचिप सुनने को मिलता है तो आप ये मान के चलिए।
वो Large Cap कंपनी की बात कर रहे हैं।
उम्मीद करता हूँ की आपको ये Difference Between Large Cap Mid Cap and Small Cap का पूरा कॉन्सेप्ट अच्छे से क्लियर हो गया हो। अगर आप अपने विचार शेयर करना चाहते हैं, इस आर्टिकल से रिलेटेड या इस वेबसाइट से रिलेटेड तो नीचे कमेंट सेक्शन में कर सकते हैं इन्फैक्ट आप टॉपिक भी सजेस्ट कर सकते हैं फ्यूचर आर्टिकल के लिए मैं हर रोज़ फाइनैंस के इसी तरीके के इनफॉर्मेटिव आर्टिकल शेयर करता रहता हूँ। अगले आर्टिकल तक सीखते रहिए, कमाते रहिए और हमेशा की तरह खुश रहिये। धन्यवाद।
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